Tuesday, April 2, 2019

रसगुल्ला मिर्च टीडीपी का गला पकड़ेगी, पर वोटर पानी भी नहीं देगा

अमित कुमार निरंजन, विजयवाड़ा. कृष्णा नदी के किनारे बसा है विजयवाड़ा। कृष्णा का यही किनारा अमरावती को भी जोड़ता है। तेलंगाना से अलग होने के बाद अमरावती (गुंटूर लोकसभा क्षेत्र) को आंध्र की राजधानी बनाया गया है। यहां हाईटेक सचिवालय है। जहां टॉयलेट का फीडबैक देने के लिए हर शौचालय के सामने  टैब लगे हैं। सचिवालय की दूसरी मंजिल पर कंट्रोल रूम से राजमुंदरी जिले में बन रहे पोलवरम बांध के काम की निगरानी की जा रही है। हालांकि, यहां के हाईटेक कैमरे कंट्रोल रूम से दो किमी दूर कूड़ा ले जा रही एम रूपा की हताशा और गुस्सा नहीं देख पाते।

अमरावती से सटे मंडम गांव से कूड़ा ले जा रही एम रूपा नगर निगम  कर्मचारी हैं। हाथ में न ग्लव्स हैं न मुंह पर मास्क। वजह पूछने पर भड़क जाती हैं। कहती हैं कि हमसे जबरन काम कराया जा रहा है। तीन महीने से पैसा नहीं मिला। सीएम कहते हैं- चुनाव का समय है। सफाई ठीक होनी चाहिए। तनख्वाह क्यों नहीं मिली...इसकी वजह बताते हुए कहती है- अफसर, नेता हमारा पैसा खा जाएंगे तो  सैलरी का फंड कहां से आएगा।

एम रूपा की स्थिति आंध्र की दूसरी ही तस्वीर दिखाती है। विकास की इस इमारत में निचला तबका सिर्फ नींव है। उधर, आंध्र के दक्षिणी हिस्से यानी कोस्तांद्रा की 7 लोकसभा सीट मच्छीपत्तनम, विजयवाड़ा, गुंटूर, नरसरावपेट, बापटला, ओंगोल और नैल्लोर की जमीनी हकीकत अलग है। यहां मिर्च के उचित दाम नहीं मिलने से किसान की जिंदगी बेहद तीखी हो गई है और पानी नहीं मिलने से नाराज वोटर सरकार का गला सूखाने के लिए तैयार बैठे हैं।

विजयवाड़ा के इनाडु अखबार में  डेढ़ दशक से राजनीति कवर कर रहे  धनजंय टेकाले  आंध्र का  चुनावी सार बताते हुए कहते हैं- प्रदेश की लोकल इंटेलिजेंस यूनिट (एलआईयू) के मुताबिक लोकसभा चुनाव में वायएसआर को 14 और टीडीपी को 10 सीट मिल सकती है। वहीं विधानसभा में वायएसआर को करीब 90 और टीडीपी को करीब 80 सीटें मिल सकती हैं।

मच्छीपत्तनम विजयवाड़ा से 60 किमी दूर है। ये वो शहर है जो एक समय ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रमुख  व्यापारिक केंद्र  था। यहां अंग्रेजों के जमाने का बंदरगाह है। रत्न  वाॅच कंपनी के मालिक रवींद्र बाबू कहते हैं करीब सौ साल पहले तूफान के समय ब्रिटिश कलेक्टर ताोरिन हिल ने शहरियों की खूब मदद की थी, अब अफसर पैसा खाते हैं।

मच्छीपत्तनम की खासियत यह है कि नोटा यहां पिछली बार चौथे नंबर पर था।  बंदरगाह का बड़ा मुद्दा है। करीब 40% कापू वोट है। एंटी इनकंबेंसी और जनसेना के अकेले मैदान में उतरने से कापू वोट टीडीपी से कट सकता है। इसका फायदा वाईएसआर को मिल सकता है।

भारत यात्रा के इस चरण में एनटीआर का पैतृक गांव निम्माकुरू भी पड़ा। यहां सरकारी स्कूल, अस्पताल और पक्की सड़क है। बस भी चलती है। इससे उलट, गुंटूर अलग ही कहानी बयां करता है। यहां मेरिकापुड़ी गांव में तेज धूप के बीच महिला किसान डी भूलक्ष्मी मजदूरों के साथ मिर्च की छंटाई में जुटी हैं। मिर्च का नाम भले ही रसगुल्ला हो लेकिन पांच साल में इसकी कीमत में इजाफा बहुत ही मामूली हुआ है। कीमत सिर्फ 30% बढ़ी है लेकिन मजदूरी दाेगुनी हो गई। मिर्च के नुकसान से जिंदगी तीखी हो गई है।

90 किमी आगे नरसरावपेट में पानी सबसे बड़ा मुद्दा है। एस के ख्वाजा  एसआर कुत्तु  कॉलोनी में रहते हैं और उन्हें पानी लेने के लिए  रोजाना सुबह दो किमी दूर तक जाना पड़ता है। कहते हैं- इस बार पानी के नाम पर ही वोट दूंगा। ऐसे ही हालात ओंगोल के हैं। ओंगोल में जुबैन प्रजाति का बैल मिलता है। तमिलनाडु और आंध्रप्रदेश में यह लड़ाने के काम आता है। यहां श्री कृष्णा मंदिर इस प्रजाति के बैलों काे पालता है।

केयरटेकर जी. गुरवैया कहते हैं कि गौशाला में बोरिंग तो है, लेकिन पानी की इतनी किल्लत है कि जानवरों को पीने का पानी नहीं मिलता। 100 किमी दूर नैल्लोर पहुंचते-पहुंचते पानी और सूखता जाता है। यहां पुल से गुजरने पर पहली नजर में बंजर जमीन दिखती है। लोगों ने बताया ये पेन्ना नदी है। जिसमें दूर-दूर तक पानी की एक बूंद भी नहीं दिख रही थी। नैल्लोर में पिछली बार वाईएसआर नेता मेकाचंति राजा मोहन रेड्‌डी सांसद चुने गए थे। इस बार इन्हें टीडीपी ने टिकट दिया है।

क्षेत्रीय स्तर पर पीने का पानी और प्राइवेट पोर्ट प्रमुख मुद्दा है। रेड्‌डी वोट की संख्या करीब 50% है। इसलिए एंटी इनकम्बेंसी का असर यहां नहीं होगा। बापटला  और ओंगोल, इन दाेनों क्षेत्रों का राजनीति और सामाजिक मिजाज लगभग एक जैसा है। बापटला में रामायापट्नम पोर्ट का मुद्दा अहम है। क्योंकि इससे रोजगार बढ़ने की संभावना है। लेकिन काम ही शुरू नहीं हो पाया।

फ्रीलांसर राजनीतिक शोधकर्ता अनंत कुमार कहते हैं- इस बार आंध्र में पानी, विकास और भ्रष्टाचार प्रमुख मुद्दे हैं। 1993 के बाद से राज्य के हर चुनाव जाति केंद्रित हो गए हैं। आंध्र प्रदेश कांग्रेस कमेटी की सदस्य पद्मश्री ने बताया कि राज्य में फिलहाल तो विशेष राज्य का दर्जा ही मुद्दा है। वाईएसआर के मीडिया कॉर्डिनेटर मस्तान ने कहा लोग प्रदेश में बदलाव के लिए वोट करने वाले हैं।

सबसे बड़ा फैक्टर क्या रहेगा?

मुद्दे- मिर्च, काॅटन के अलावा भ्रष्टाचार : मिर्च व कॉटन के दाम के अलावा भ्रष्टाचार और विकास भी मुद्दा है। पानी का मुद्दा भी उछल रहा है। राज्य सरकार को एंटीइनकंबेंसी का सामना करना पड़ सकता है। सर्जिकल स्ट्राइक, ट्रिपल तलाक का मुद्दा बहुत कम है यानी भाजपा को इसका फायदा नहीं मिलेगा। नोटबंदी का असर है।

जाति- कोपू, दलित और किसान यहां निर्णायक रहेंगे : कोपू, दलित वोट के अलावा यहां खम्म और वाशियार वोट अहम हैं। यह चार सीटों पर असर डालेंगे। मिर्च, कॉटन की खेती करने वालेे 70% किसानों का वोट भी असर डालेगा। जनसेना के अलग लड़ने से टीडीपी का कोपू वोट कट सकता है। सात लोकसभा सीटों पर कोपू  वोट करीब 30%, दलित 25%, रेड्‌डी और  नायडू वोट 15%  और खम्म 10%  हैं।

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