सबरीमला में इतिहास रचने वाली कनकदुर्गा को उनके पति ने स्वामी अयप्पा मंदिर में प्रवेश करने के बाद घर से निकाल दिया था.
अब वो कोर्ट के आदेश के साथ अपने पति के घर लौटने की तैयारी कर रही हैं.
कनकदुर्गा ने बीबीसी से कहा, "मंदिर में प्रवेश के लिए किसी भी हिंदू संगठन या अपने परिवार से मैं कभी माफ़ी नहीं मांगूंगी."
उन्होंने कहा, "मैंने वही किया जिसका सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था. मैंने किसी के साथ अन्याय नहीं किया है. अपने घर में प्रवेश के लिए मैं क़ानून का सहारा लूंगी."
कनकदुर्गा को मलप्पुरम ज़िले में स्थित घर में प्रवेश नहीं करने दिया गया था. उनके पति ने पुलिस से कहा था कि कनकदुर्गा के लिए घर में कोई जगह नहीं हैं. इसके बाद से वह महिलाओं के एक सरकारी आश्रयस्थल में रह रही हैं.
सास ने कथित तौर पर डंडे से मारा
38 वर्षीय कनकदुर्गा मंगलवार को अस्पताल से लौटीं, जहां वो सिर पर लगी चोट के कारण भर्ती थीं.
स्वामी अयप्पा मंदिर में प्रवेश करने से हुई परिवार की बदनामी की वजह से सास ने उन्हें कथित तौर पर डंडे से मारा जिसकी वजह से उन्हें यह चोट लगी थी.
2 जनवरी को स्वामी अयप्पा मंदिर में प्रवेश के बाद से ही बीजेपी सहित हिंदुवादी संगठनों के संरक्षण वाली सबरीमला कर्म समिति के प्रदर्शनकारियों के डर से कनकदुर्गा और बिंदु अम्मिनी छुप गई थीं. ये लोग चाहते हैं कि 'रजस्वला' महिलाएं (जिनके पीरियड्स आते हैं) मंदिर में प्रवेश न करें.
सबरीमला जाने से पहले परिवार से क्या कहा?
माना जाता है कि सबरीमला में मौजूद मंदिर के भगवान स्वामी अयप्पा कुंवारे हैं और इस कारण 'रजस्वला' होने वाली उम्र के दौरान यानी 10 से 50 साल की महिलाएं मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकतीं.
कनकदुर्गा पर कथित हमला उसी दिन हुआ जब मंदिर में प्रवेश के बाद वह अपने घर लौटी थीं.
वो कहती हैं, "मैं सरकारी शेल्टर में गई क्योंकि मेरे पति ने मुझे घर में अंदर जाने की इजाज़त नहीं दी. मुझे लगा कि वो राजनीतिक कर रहे लोगों से प्रभावित हैं."
कनकदुर्गा ने कहा कि जब उन्होंने अपने परिवार के सदस्यों को अयप्पा मंदिर जाने की अपनी इच्छा के बारे में बताया था तो उन्होंने कहा कि इस तरह का ख़तरा मोल मत लो.
वो कहती हैं, "मैंने उन्हें यह नहीं बताया था कि मंदिर में कब प्रवेश करूंगी. जिस दिन मैंने मंदिर में प्रवेश किया, उन्होंने मुझसे घर लौट आने को कहा. उन्होंने यह भी नहीं बताया कि मुझे दोबारा घर में नहीं आने दिया जाएगा."
बड़े भाई का मिला साथ
28 सितंबर को 4-1 से दिए गए सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले में कहा गया था कि भेदभावपूर्ण परंपरा से अधिक महत्वपूर्ण महिलाओं का मौलिक अधिकार है. वर्षों से चली आ रही परंपरा को इसी फ़ैसले के अनुसार तोड़ने के कनकदुर्गा के निर्णय पर उनका परिवार एकमत नहीं दिखता है.
कनकदुर्गा कहती हैं, "मैंने अपने बड़े भाई को नहीं बताया था कि मैं सबरीमला जाऊंगी. लेकिन जब मैं लौटी तो ब़ाकी परिजनों की तरह उन्होंने मुझसे अमानवीय व्यवहार नहीं किया. जब मैं सरकारी आश्रय में गई तो उन्होंने ही मुझे क़ानूनी सहायता दिलाई. सभी परिस्थितियों में वो मेरे साथ बने हुए हैं और मुझसे हर दिन बात करते हैं."
छोटे भाई ने बीजेपी से मांगी माफ़ी
कनकदुर्गा ने मीडिया में सुना था कि उनके छोटे भाई ने उनके मंदिर में प्रवेश करने को लेकर बीजेपी से माफ़ी मांगी थी.
उन्होंने कहा, "अगर मुझे लगता कि मैंने कोई ग़लती की है तो माफ़ी मैं मांगती. मेरी जगह पर मेरे भाई को माफ़ी मांगने की कोई ज़रूरत नहीं है. अगर उन्होंने माफ़ी मांगी है, जैसा कि मीडिया रिपोर्ट में बताया गया, तो यह उनकी भूल है."
बच्चों से नहीं हुई मुलाक़ात
कनकदुर्गा ने कहा, "निश्चित ही मैं अपने बच्चों की कमी महसूस कर रही हूं. 22 दिसंबर (जब सबरीमला मंदिर में प्रवेश के पहले प्रयास के लिए घर से निकली थीं) से ही मैंने अपने बच्चों को नहीं देखा है. मेरे परिवार ने मुझे उनसे मिलने का मौका नहीं दिया है. 15 जनवरी के बाद सिर्फ 10 मिनट के लिए फ़ोन पर उनसे थोड़ी बात हो सकी है."
साथ ही वो यह कहती हैं, "मुझे उन्हें यह समझाने का अवसर नहीं मिला कि मैंने ऐसा क्यों किया. मैं न उनसे मिली हूं और न ही ठीक से उनसे बात की है."
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